ऐसा लगता है कि अफ़ग़ान समस्या की शुरुआत से ही दुनिया की नज़र केवल आतंकवाद पर रही है. लेकिन धार्मिक कट्टरवाद पर किसी ने ध्यान नहीं दिया.
आतंकवाद एक मानसिकता और विचारधारा है जो किसी इंसान को हथियार उठाकर लड़ने के लिये तैयार कर देती है.
आतंकवाद को सही ढंग से समझने के लिए ऐसे विचार करें कि एक पहाड़ है जिसकी चोटी पर बर्फ़ जमी हुई है. ये बर्फ़ पिघलकर नीचे आती है और नदी का रूप ले लेती है.
मगर इसपर ज़रा भी विचार नहीं किया गया कि ये बर्फ़ जमती क्यों है, फिर पिघलती क्यों और कैसे है. और कैसे पानी नीचे आता है.
यानी ये हथियारबंद संगठित समूह जो युद्ध के मैदान में लड़ने के लिए खड़े हैं, उसके पीछे क्या कारण है.
इन हथियारबंद समूहों से पहले वे लोग हैं जो इनको ट्रेनिंग देते हैं. वो आतंकवाद की विचारधारा को फैलाते हैं और इसका प्रचार-प्रसार भी करते हैं.
इनको आर्थिक सहायता प्रदान करते हैं. और इसके पीछे वे लोग हैं जो इन आतंकवादियों को अपना रणनीतिक अंग समझते हैं.
इन आतंकवादियों के बलबूते पर वो दूसरी सरकारों से फ़िरौती वसूल करते हैं. ये वही लोग हैं जो आतंकवाद को केवल कटुता फैलाने के लिए इस्तेमाल करते हैं.
मगर अफ़सोस की बात यह है कि अफ़गान समस्या के संदर्भ ऐसे समूहों और लोगों को कभी संजीदगी से लिया ही नहीं गया, और इस ओर कोई ध्यान ही नही दिया गया.