आंतकवादी मानसिकता किस तरह तैयार की जाती है

ऐसा भी नहीं है कि केवल एक विशेषज्ञ ही यह पता लगा सकता है कि चरमपंथी किसी चरमपंथी मां के गर्भ से जन्म नहीं लेता है, बल्कि वास्तविकता ये है कि इसके लिए सब से पहले दिमाग़ और ज़ेहन में संशय और अविश्वास का भावना भरा जाता है, फिर यही सोच एक संस्था का रूप लेता है जहां पर इन आतंकवादियों का ब्रेनवॉश होता है.

और इस प्रकार के अनेकों चरणों से गुजर कर एक मनुष्य खुदकुश हमलावर के रूप में बाहर निकलता है, जो मरने मारने के लिये हमेशा तैयार रहता है.

एक साधारण मनुष्य भी ये जान सकता है कि इन खुदकुश हमलावरों के विरुद्ध लड़ने और धन-बल खर्च करने के बजाए उचित क़दम ये होगा कि इन लोगों को इस अवस्था तक आने से पहले इन पर ध्यान दिया जाये और इन का रोकथाम किया जाये.

इसलिए पहले चरमपंथ के उद्गम स्थल और इसके स्रोत का पता लगाया जाए, जहां से इनको ट्रेनिंग मिलती है.

इन विचारधाराओं का पता लगाया जाए जो इन लोगों को आत्मघाती बनाते हैं. और उन स्रोतों तक पहुंचा जाए जहां से इन लोगों को आर्थिक और अन्य सुविधाएं मिलती हैं.

ऐसे नेटवर्क पर शिकंज़ा कसा जाए जो इन को बरगलाते हैं और इस काम के लिए बहाल करते हैं और उन लोगों को भी घेरा जाए जो चरमपंथ की व्यख्या इस्लामी शरिअत के अनुरूप करते हैं और साथ उन समूहों और व्यक्तियों को सामने लाया जाए जो चरमपंथियों को असहाय और मजबूर मानते हैं.

जो आदमी धर्म के नाम पर बेगुनाह का क़त्ल और ख़ून करता है. ऐसा आदमी ट्रेनिंग के दौरान ही अपना विवेक खो चुका होता है और स्वयं इस चरमपंथी विचारधारा का शिकार बन चुका होता है.

मैदान में आने के पहले ही इन लोगों का दिल और दिमाग ज़ेहन और मस्तिष्क चरमपंथ के विचारधारा के विष से विषाक्त हो चुका होता है और उन्हें इस अवस्था तक लाने के लिये बहुत ही अधिक धन खर्च किया जाता है.

जब किसी आदमी की ट्रेनिंग इस हद तक पूरी हो जाती है तो फिर ऐसे लोगों का कोई इलाज नहीं बचता है, केवल यह के इनके विरुद्ध सुरक्षा का सख्त प्रबंध किया जाए और सामने आने पर इनसे लड़ा जाए.

आजकल अफ़ग़ानिस्तान में चरमपंथ के विरुद्ध केवल यही एक काम किया जा रहा है और इसी एक काम पर समस्त धन-बल खर्च किया जा रहा है.

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